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ॐ गं गणपतये नमः ॐ कुल देवी देवताभ्यो नमः
कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनायू च ॥
नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥
नमः पंकज नाभाय नमः पंकज मालिने ॥
नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाघ्रये ॥
वसुदेव के पुत्र देवकीनन्दन, नन्दकुमार श्री गोविंद को बार बार नमस्कार है। जिनको नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है। जो कमलो की माला धारण किये हैं जिनके कमल के सदृश सुन्दर नेत्र व चरण है,उन श्री कृष्ण चंद्र को नमस्कार हैं I
योग शास्त्र की महिमा को तोलना बडा कठिन है, भगवान ने अपने श्री मुख से उसकी प्रशंसा की है। वेद वेदांग समृति पुराण तथा दर्शन ग्रंथो मे योग सिद्धि के उपाय व साधन का वर्णन है। योग शास्त्र मनुष्य को भी दिव्य शक्तियो से सम्पन्न कर सकता है । योग शास्त्र के द्वारा ही वरिष्ठ विश्वामित्र इत्यादि महर्षि को अपार शक्ति प्राप्त हुई। योग शास्त्र के द्वारा ही पर-काय प्रवेश, रस विद्या, मंत्र तंत्र आदि का जगत मे इतना प्रचार है कि मनुष्य आश्चर्यचकित रह जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में उस युद्ध के अंतर को मुक्त कर देने वाले दिव्य योग की आलौकिक शक्ति का महत्व सुनाया, उन्ही उपदेशों को आज “श्रीमद् भगवत गीता जी” के नाम से जाना जाता है।
प्राचीन काल में ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ ने विश्वामित्र के क्षात्रबल को अपने ब्रह्मबल से शांत कर दिया I उस युद्ध मे योग की अद्भुत शक्ति से में उत्पन्न ब्रहम तेज ने वशिष्ठ ब्रह्मदण्डू में प्रवेश कर विश्वामित्र के क्षात्रतेज समन्वित समस्त अक्षय अस्त्र शस्त्रों को बात- बात मे भस्म कर डाला तभी से वसिष्ठ योगेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।
वहीं विश्वामित्र जो पराजित हुए थे उसी योग बल से ब्रह्मऋषि पद को प्राप्त हुए उन्होंने नयी सृष्टि की रचना प्रारम्भ कर दी जिसे देखकर मनुष्य तो क्या देवता भी आश्चर्यचकित हो गये इसके बाद विश्वामित्र भी योगेश्वर कहलाने लगे और त्रिलोकी मे उनका मान हो गया I रामायण काल के प्रसिद्ध महर्षि भारद्वाज जो सत्वगुण की मूर्ति एवं सूक्ष्म विवेक से सम्पन थे, चित्रकूट जाते समय ' कैकयी नन्दन भरत कुमार का अदभुत आथित्य किया था इस बात को सब लोग जानते है भारद्वाज भी तभी से योगेश्वर कहलाने लगे I भृकुण्ड के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि ने अपने योगबल से चिरंजीवी होकर उन यमराज को भी जीत लिया, जो सारे भूत प्राणियों को उनके कर्मानुसार फल देते है I अखिल विश्व के सृष्टा पालन कर्ता और स्वामी परमपिता परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण पर निर्भर रहकर योग सिद्धियों को प्राप्त किया । श्री कृष्ण पर निर्भर रहने वाले महर्षि जब योगेश्वर हो गये तो श्री कृष्ण को योगेश्वरो के ईश्वर कहलाने मे क्या आश्चर्य। श्री कृष्ण को योगशक्ति दिखलाने के लिए असाधारण प्रयास आवश्यकता नहीं थी। श्री मदभागवत मे ऐसी घटनाओ का वर्णन है जिसमे श्री कृष्ण ने अपूर्व योगबल से काम लिया | परन्तु ऐसा करने में उन्हें कोई श्रम नही हुआ। जन्म के कुछ समय बाद ही जब पूतना राक्षसी जिसमे हजारो मत्त हाथियो का बल था उन्हें उठाकर ले गयी और विष मिश्रित दूध पिलाने लगी किंतु शिशु रूप भगवान ने यमराज के सदृश दूध के साथ ही उसके प्राणो को हर लिया, सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ भगवान को ऐसा करने मे लेशमात्र भी थकावट नही हुई। श्री कृष्ण ने जीवन के दूसरे वर्ष मे अपने से संकल्प बल से बिना परिश्रम के केवल एक ऊँगली की सहायता से सैकड़ों बर्षो पुराने यमलार्जुन के वृक्षो को खेल खेल मे उखाड डाला? यशोदा माता को ब्रह्माण का दर्शन करायो, पांच वर्ष की अवस्था मे अब असंख्य घथियो के ब्ल वाले अघ और बक नामक भयंकर असुरों को परास्त किया। सात वर्ष की अवस्था में इन्द्र का दर्प चूर करने के लिए विशाल गोवर्धन पर्वत को अपने बाये हाथ की अंगुली पर अनायास ही उठा लिया। नौवे वर्ष मे कालिन्दी के जल को जो कालिया नाग सर्प के विष से कुलषित हो रहा था शुद्ध करके सबके पीने योग्य बना दिया इसी वर्ष उन्होने ब्रज की सहस्त्रो अप्रितम सुन्दर गोपियों को प्रसन्न करने के लिए महारास किया, चार प्रहर की रात को आलौकिक शक्ति से अक्षय बना दिया।
अतः श्री कृष्ण ही योगेश्वर के ईश्वर हैं I योग योगेश्वर श्री कृष्ण के चरण कमलो मे कोटि-कोटि नमन